जीवन में सफलता के महत्व से हम सभी लोग परिचित हैं। लेकिन क्या जीवन का पर्याय सफलता के अलावा कुछ नहीं है ? हम असफल हुए नहीं कि जीवन को ही नकारने लगते हैं, हर किसी को अपनी खुशियों का दुश्मन समझने लगते है जबकि यह अपने प्रति ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यता के प्रति भी अन्याय है।
सफलता और असफलता तो पल भर के लिए है। कोई भी व्यक्ति न तो स्थायी असफल होता है और न ही स्थायी सफल । किसी एक क्षेत्र में असफल हुआ व्यक्ति दूसरे किसी क्षेत्र में गौरवपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित कर सकता है। परिवर्तन के नियम से संचालित विश्व में दिन-रात, सर्दी-गर्मी, धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता का क्रम भी प्राकृतिक है। जो असफलता आज हमें दिखाई पड़ती है वह वस्तुतः सफलता का एक सोपान मात्र है। हमे सफलता को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहने चाहिए ना कि असफलता के डर से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से भटकना चाहिए। एक पत्थर के बड़े टुकड़े को तोड़ने के लिए हथौड़े से कई प्रहार किये जाते है लकिन उसके छोटे -छोटे टुकड़े उसके अंतिम प्रहार में होते है। "तो क्या अंतिम प्रहार के पूर्व सभी प्रयासों को विफल माना जाये। यह तथ्य गलत है। "
जीवन में सफलता का मूल मंत्र हैं -"हर असफलता को सफलता के प्रथम पग के रूप में स्वीकार करना।" प्रयास कितना ही अधूरा, छोटा या अपूर्ण हो यदि सतत जारी रहता है तो प्रत्येक चरण में हुई भूलो से कुछ सीखते हुए सुधार क्रम भी चलता रहेगा और अंततः समय आने पर पूर्णता लक्ष्य भी प्राप्त हो जायेगा ।
